On the second day too, the streets of the city were roamed by the vagrants, today a mass meeting will be organized at Gadisar | दूसरे दिन भी शहर की गलियों में घूमी गैरें, आज गड़ीसर पर होगा सामूहिक गोठों का आयोजन – Jaisalmer News

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जैसलमेर की गलियों में दो दिन से गूंज रहे होली के गीत मंगलवार को थम गए। एकादशी से गैरों की शुरुआत होती है। इसके बाद गैरिये अपने भाइयों के घर जाकर फाग के गीतों के जरिए बधाई देते हैं। गैरियों को एकादशी से त्रयोदशी तक तीन दिन मिलते हैं। इन दो दिनों में वे दिन-रात घूमकर हर घर तक पहुंचते हैं। जैसलमेर की होली का विशेष महत्व है। मान्यता है कि गैरों को शुभ संकेत माना जाता है। लोग भी गैरों के आने का इंतजार करते हैं।

इस बार भी एकादशी से गैरों की शुरुआत हुई। इसके बाद गैरिये चार धड़ों में बंट गए। जहां-जहां से गैर निकलीं, वहां की गलियां अबीर-गुलाल से सराबोर हो गईं। पूरा शहर रंगों में रंग गया। सड़कों पर बिखरी गुलाल गैरों की निशानी बन गई। युवाओं ने जमकर होली का आनंद लिया। राह चलते लोग भी फाग गीतों का लुत्फ उठाते रहे।

जैसलमेर में एकादशी से त्रयोदशी तक गैरों का आयोजन होता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार होली मनाई जाती है। कभी गैरों को पूरे तीन दिन मिलते हैं, लेकिन अधिकतर दो दिन ही मिलते हैं। इन दो दिनों में गैरिये रातभर घर-घर जाकर गीत गाते हैं। अब गोठ की तैयारियों में जुटने से गैर थम जाएंगी। बुधवार को चारों धड़ों की गोठ होगी। इसके बाद पूर्णिमा पर होलिका दहन और धुलंडी के दिन होली खेली जाएगी। जैसलमेर में होलाष्टक लगते ही होली का रंग चढ़ने लगता है। एकादशी तक यह जोश चरम पर पहुंच जाता है। फाल्गुन एकादशी के दिन भगवान कृष्ण के वंशज और भाटी राजपरिवार के सदस्य लक्ष्मीनाथजी मंदिर में भगवान के साथ होली खेलते हैं। पूर्व महारावल खुद मंदिर पहुंचकर रसियों के साथ होली खेलते हैं। शाम को पुष्करणा समाज की अलग-अलग गैरें निकलती हैं। सभी गैरें पूर्व महारावल के निवास पर पहुंचती हैं। रास्ते में और महारावल के सामने श्लील गालियां गाई जाती हैं। इसके बाद महारावल गैरियों को होली की गोठ के लिए नेग देते हैं। फिर गैरें अलग-अलग धड़ों में बंट जाती हैं और शहर के घरों में जाकर फाग गाती हैं। होलिका दहन से पहले बहनें गोबर से बने कंडों की माला बनाती हैं। रक्षाबंधन की तरह इस दिन भी बहनें भाइयों के घर जाकर कंडों की माला उनके सिर पर फेरती हैं। मान्यता है कि इससे भाई पर आने वाली विपदाएं टल जाती हैं। शाम को यही माला होलिका दहन में जलाई जाती है। जैसलमेर में सबसे पहले राजपरिवार द्वारा होलिका दहन किया जाता है। इसके बाद मुहूर्त के अनुसार आम लोग दहन करते हैं।

नवविवाहित जोड़े होलिका के चारों ओर फेरे लगाकर आशीर्वाद लेते हैं। धुलंडी के दिन जैसलमेर के दुर्ग में पुष्करणा व्यास बादशाह-शहजादे का स्वांग रचते हैं। चैनपुरा में पुष्करणा पुरोहित शिव-पार्वती का रूप धारण करते हैं, जिसे जिंदा-जिंदी कहा जाता है। होलिका दहन के बाद गोबर के कंडों की राख से कन्याएं और महिलाएं ईसर-गवर बनाती हैं। धुलंडी से 15 दिन तक इनकी पूजा होती है।

जैसलमेर की होली का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि होली या तो बरसाने की होती है या जैसाणे की। बरसाने में ठाकुरजी के साथ होली खेलने की परंपरा है। जैसलमेर में भी होली की शुरुआत नगर आराध्य लक्ष्मीनाथजी मंदिर से होती है। होलाष्टक लगते ही रसिये दुर्ग स्थित लक्ष्मीनाथजी मंदिर में फाग गायन शुरू कर देते हैं। यहां कई पारंपरिक गीत गाए जाते हैं।



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