vikram Samvat – ईसा से 57 साल पहले हुआ एक महायुद्ध, फिर शुरू हुआ विक्रम संवत… जानिए हिंदुओं के नए साल की शुरुआत की कहानी – chaitra shukla pratipada vikram samvat hindi new year nav varsh navratri starting ntcpvp

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी आज से नवरात्र की शुरुआत तो हो ही रही है, इसके साथ ही शुरू हो रहा है नव संवत्सर यानी विक्रम संवत 2082. इसे हिंदू नववर्ष कहा जाता है और सनातन परंपरा के प्रतीक के रूप में काल गणना के लिए सबसे सटीक कैलेंडर के तौर पर जाना जाता है. दावा है कि विक्रम संवत सूर्य और चंद्र दोनों ही की गतियों पर आधारित सबसे सटीक कैलेंडर है, जिसमें 12 मास हैं और ग्रहों पर आधारित सात दिनों के सप्ताह की गणना की देन भी यही प्राचीन कैलेंडर है. 

सटीक हैं विक्रम संवत के दावे
विक्रम संवत के बारे में जो भी दावे किए जाते हैं, वह सटीक ही बैठते हैं, क्योंकि इसे बनाने वाले प्राचीन भारत के खगोल विद्या के जानकार आचार्य वाराह मिहिर थे. उन्होंने पृथ्वी की सूर्य के चक्कर लगाने की सही गणना कर, दिन और रात का समय निर्धारित किया और इसी आधार पर तिथियों को भी रखा. तिथियों की गणना पल, प्रतिपल, घटी, मुहूर्त और पहर में इतने सूक्ष्म तरीके से विभाजित है कि इसमें कहीं भी त्रुटि नहीं हो सकती है.  विक्रम संवत अधिक वैज्ञानिक है, लेकिन उसे अव्यावहारिक और जटिल बताकर लागू नहीं किया गया जबकि नेपाल में विक्रम संवत ही प्रचलित है.

वैज्ञानिक सिद्धांतों पर खरा उतरता है विक्रम संवत
संस्कृत के विद्वान रहे और भारत रत्न प्रोफेसर पांडुरंग वामन काणे ने अपनी पुस्तक ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में विक्रमी संवत का जिक्र किया है. वह लिखते हैं कि ‘विक्रम संवत सबसे वैज्ञानिक है पश्चिमी कैलेंडर में सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण और अन्य खगोलीय परिस्थितियों की कोई जानकारी पहले से नहीं मिलती है, जबकि विक्रम संवत बता देता है कि आने वाले किस दिन ग्रहण होगा, बल्कि यह गणना करके अगले कई वर्षों के भ ग्रहण बता देता है. यह ऋतुओं के साथ-साथ ग्रह नक्षत्रों की पूरी स्थिति को भी बताता है.”

विक्रम संवत में वर्ष को सौर वर्ष और मास को चंद्रमास कहते हैं. यहां यह भी बताना जरूरी है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से सिर्फ उत्तर भारत में ही नया वर्ष शुरू होता है. दक्षिण भारत में विक्रम संवत का नया वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष से शुरू होता है. 

विक्रम संवत की शुरुआत कैसे हुई?
सवाल उठता है कि विक्रम संवत की शुरुआत कैसे हुई और यह अस्तित्व में कैसे आया और किसने इसे कैलेंडर के तौर मान्यता देते हुए स्थापित किया? पौराणिक संदर्भों को देखें तो ब्रह्मपुराण में भी इसका जिक्र मिलता है. इसके अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष् की  शुरुआत का दिन माना जाता है. यह ब्रह्मा का भी पहला दिन है. इसी दिन भारतवर्ष में काल गणना की भी शुरुआत मानी जाती है. लेकिन, भारत में जो ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है,  उसकी शुरुआत ईसा मसीह के जन्म से मानी जाती है. विक्रम संवत, ईस्वी वर्ष से 57 वर्ष पहले शुरू होता है.

जैन ग्रंथ में भी होता है जिक्र
विक्रम संवत की शुरुआत करने में एक प्रतापी राजा का नाम आता है, जिनका नाम था विक्रमादित्य. जैन ग्रंथ कल्काचार्य कथा की मानें तो विक्रम काल की स्थापना राजा विक्रमादित्य द्वारा की गई थी. इस ग्रंथ में उनके द्वारा किसी राजा पर विजय की बात भी दर्ज है, जिसका नाम आकाश बताया जाता है. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाती है कि वह राजा शक या हूण है. हालांकि, पुरातत्विद  वी.ए. स्मिथ और डी.आर. भंडारकर का मानना रहा है कि, चंद्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी और इसी ने उस वक्त के कैलेंडर का नाम बदलकर ‘विक्रम संवत’ कर दिया था. 

नाटक ‘गरुण ध्वज’ के कथानक में शामिल है विक्रम संवत
प्रसिद्ध नाटककार और लेखक पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र ने बीती शताब्दी में एक नाटक लिखा था. नाम था ‘गरुण ध्वज’ इस नाटक में जो सिनेरियो है वह इसके हिसाब से पहली शताब्दी के पहले का है. नाटक में जो एक प्रमुख पात्र है वह है विक्रममित्र. विक्रममित्र की छवि भीष्म पितामह जैसी है. वह 88 वर्ष के लेकिन परमवीर योद्धा हैं और अविवाहित हैं. राज्य का शासन वही चला रहे हैं, लेकिन खुद को महाराज नहीं सेनापति कहलवाते हैं. 

इन्हीं विक्रममित्र के दरबार में एक नायक है विषमशील. साहसी और प्रतिभावान है. उनके पिता महेंद्रादित्य भी राजा रह चुके हैं, लेकिन किसी युद्ध में वीरगति के प्राप्त होने के बाद शुंगवंशी विक्रममित्र ही राज्य का शासन संभाल रहे हैं. नाटक के क्लाइमैक्स में वर्णन आता है कि विषमशील ने मालव राज्य को शक क्षत्रपों से बचाया और उन्हें भारतीय प्रायद्वीप की सीमा से बाहर खदेड़ दिया. इसके बाद जब वह उज्जियिनी लौटते हैं तो वहां उनका भव्य स्वागत होता है.विक्रममित्र उन्हें अगला राजा बनने के लिए हर तरह से योग्य पाते हैं और फिर उनका राज्याभिषेक किया जाता है. 

राज्याभिषेक के दौरान उनका नया नामकरण भी होता है. सेनानायक विक्रममित्र के नाम में से विक्रम और पिता महेंद्रादित्य के नाम में से आदित्य नाम लेकर उनका नाम विक्रमादित्य किया जाता है. इस नए नाम की घोषणा खुद कवि कालिदास करते हैं. जो पूरे नाटक के दौरान कवि के साथ-साथ एक योद्धा के तौर पर भी नजर आते हैं. खुद सेनानायक विक्रममित्र ने ही उनका लालन-पालन कर उन्हें शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा दी थी. कवि कालिदास नए राजा विक्रमादित्य के दरबार में उनके प्रमुख सलाहकार और प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्त होते हैं. इसी दौरान वह खगोल शास्त्री वराह मिहिर द्वारा बनाए काल गणना पटल (कैलेंडर) को लागू करते हुए उसे विक्रमी संवत का नाम देते हैं. राजा विक्रमादित्य को शकारि विक्रमादित्य की उपाधि भी दी जाती है. शकारि यानी शकों का शत्रु.

कितना प्राचीन है विक्रम संवत?

विक्रमी संवत को कैसे लागू किया गया? इस सवाल के जवाब में यही घटना कमोबेश हर जगह मिलती है. थोड़े बहुत संदर्भ आदि बदलकर यही कहानी अधिक प्रचलित है. अगला सवाल उठता है कि विक्रमी संवत कितना प्राचीन है? तो इसके सटीक जवाब के लिए जिस ग्रंथ का नाम सामने आता है, उसका इतिहास आज के राजनीतिक सिंधिया घराने से जुड़ा हुआ है. 

विक्रम स्मृति ग्रंथ

विक्रम स्मृति ग्रंथ में है पूरा विवरण
बीती शताब्दी में जब विक्रम संवत के 2000 वर्ष पूरे हुए थे तब देश भर में इस मौके पर खास कार्यक्रम आयोजित किए गए थे. ईस्वी वर्ष के मुताबिक यह मौका साल 1944 में आया था. तब ग्वालियर के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने विक्रम उत्सव मनाने की घोषणा की थी. उनकी ही पहल पर विक्रम स्मृति ग्रंथ प्रकाशित किया गया. पंडित सूर्यनारायण व्यास ने इसका संपादन किया था. राजा विक्रमादित्य, कालिदास और उज्जैनी नगरी पर यह सबसे प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है. इस ग्रंथ के लेखकों में कविवर सोहन लाल द्विवेदी, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, भगवत शरण उपाध्याय और भी कई बडे़ लेखक, शोधकर्ता और इतिहासकार शामिल हैं. 

इसी ग्रंथ में विक्रम संवत की ऐतिहासिकता और इसके प्राचीन होने के साक्ष्य का भी प्रमाण मिलता है. कई प्राचीन शिलालेखों में विक्रमी संवत बतौर तारीख दर्ज है. एक लेख में 481 संवत का उल्लेख मिलता है, जिसमें लिखा है- “कतेषु चतुर्षु वर्षशतेषु एकाशीत्युत्तरे…” और यह मालव पर्व के संदर्भ में है. इसी तरह, विजयगढ़ के एक स्तंभ पर विक्रमी संवत 428 वर्ष दर्ज है. मौखरियों के एक शिलालेख पर 295 वर्ष का अंक अंकित है. उदयपुर रियासत में नंदी स्तंभ पर 282 वर्ष का उल्लेख मिलता है. इन सबसे प्राचीन, तक्षशिला के ताम्रपत्र पर 126 वर्ष का लेख है, जो इसकी प्राचीनता को और गहराई देता है.

यूसुफजाई प्रदेश के पंजतर स्थान के समीप एक शिलालेख पर 192 संवत का उल्लेख है, जिसमें श्रावण मास की प्रथमा तिथि भी दी गई है. यह तिथि और वर्ष दोनों ही विक्रम संवत के हैं, जो इसे तक्षशिला के ताम्रपत्र से भी पुराना सिद्ध करते हैं. इसके अलावा, पेशावर जिले के तख्तेबाही स्थान पर एक और लेख मिला है, जो गोण्डाफरनंस के शासनकाल के 26वें वर्ष में लिखा गया था. इस पर वैशाख मास की पंचमी तिथि और 103 संवत अंकित है. यह भी विक्रम संवत का ही है. इस कथन की पुष्टि विद्वान रेप्सन ने भी की है। उनके अनुसार, ये तिथियाँ और वर्ष विक्रम संवत के ही संकेत हैं. उनके लेखन में इन शिलालेखों का विश्लेषण इस प्राचीन काल गणना की प्रामाणिकता को और बल देता है. 

…लेकिन असली विक्रमादित्य कौन?
लेकिन, इतिहासकारों और विद्वानों के बीच ‘असली विक्रमादित्य कौन’ इसे लेकर भी बहस रही है. कई इतिहासकार चीनी यात्री फाह्यान के संदर्भ का जिक्र करते हैं और गुप्तवंशी राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को भी विक्रमादित्य बताते हैं. चीनी यात्रा फाह्यान 380 ईस्वी के आस-पास भारत आया था. इस दौरान वह अनेक राज्यों में घूमा और भारतवर्ष का भ्रमण किया. गुप्त वंश के शासन काल में फाह्यान 6 वर्षों तक रहा. वह लिखता है कि ‘यह समय जब नदियां अपने पूरे वेग से बह रही हैं और बारिश अपने समय पर होती है. यह ऐसा देश है जहां सामान्य जन कृषि करते हैं और व्यापारी भी प्रसन्न हैं. यह गुप्तवंश का शासन है, औऱ चंद्रगुप्त सम्राट की गद्दी पर बैठे है. मालवा, काठियावाड़, गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने अपने पिता के राज्य का और भी विस्तार किया है.  

भारतवर्ष में विदेशी आक्रांताओ के आने की शुरुआत बहुत पहले ही हो गई थी. इसी क्रम में शकों ने भारत में ईसा से 100 साल पहले ही आना शुरू किया था. शुंग वंश के कमजोर होने के बाद भारत में शकों ने पैर पसारना शुरू कर दिया था. संपूर्ण भारत पर शकों का कभी शासन नहीं रहा. भारत के जिस प्रदेश को शकों ने पहले-पहल अपने अधीन किया, वे यवनों के छोटे-छोटे राज्य थे. सिन्धु नदी के तट पर स्थित मीननगर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया. भारत का यह पहला शक राज्य था. इसके बाद गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र को जीतकर उन्होंने अवंतिका पर भी आक्रमण किया था. उस समय महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग को शकों ने सातवाहन राजाओं से छीना था और उनको दक्षिण भारत में ही समेट दिया था. 

विक्रम स्मृति ग्रंथ

 चंद्रगुप्त ने भी शकों को हराया था
विदेशी आक्रांताओं के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए चंद्रगुप्त विजय के लिए निकल गया. उनका सेनापति आम्रकार्दव था, जो उन्हीं की तरह वीर और कूटनीतिज्ञ भी था. जब चंद्रगुप्त गद्दी पर बैठा तो उसकी दो प्राथमिकताएं थीं. रामगुप्त के समय में उत्पन्न हुई अव्यवस्था को दूर करना और उन म्लेच्छ शकों का उन्मूलन करना, जिन्होंने ने केवल गुप्तश्री के अपहरण का प्रयत्न किया था, बल्कि कुलवधू की ओर भी दृष्टि उठाई थी.

गुप्तकाल से पहले अवन्ती पर आभीर और अन्य शूद्रों का शासन था. चंद्रगुप्त ने शक राजा आभीर को हरा दिया और इस तरह उसने शकारि की उपाधि उसने धारण की. यह समय 385 ईस्वी के आसपास का था. कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को तभी से विक्रमी संवत कहा जाता है. 

लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का समय ईसा के 300 साल बाद का है, लेकिन विक्रमी संवत ईसा से 57 वर्ष आगे है. इससे स्पष्ट है कि शकों का दमन पहले भी हुआ है. कहीं-कहीं इसी विक्रमी संवत को मालव संवत कहा जाता है. इतिहासकारों का ऐसा भी मानना रहा है कि चंद्रगु्प्त विक्रमादित्य ने ही मालव संवत को अपनी विजय के बाद विक्रमी संवत का नाम दिया था. जबकि बहुत से इतिहासकार ईसा से पूर्व भी एक और विक्रमादित्य के होने की पुष्टि करते हैं.

मालव संवत के प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य 
ईसा की शुरुआत से 100 वर्ष पहले भारत में शक आ चुके थे और 16 महाजनपदों में बंटी भारतीय शासन व्यवस्था को धीरे-धीरे तोड़ना शुरू कर दिया था. सिंध से शुरू हुई उनकी यह यात्रा 50 सालों में भारत के मध्य में अवंतिका जिसे उज्जैन कहा जाता है, वहां तक पहुंच चुके थे. इनका राजा नह्वान था, जिसने रास्ते में खूब मराकाट मचाई थी और कहते हैं कि लूट-पाट भी की थी. इसी शक राजा का दमन विक्रमादित्य ने किया था और ईसा से 57 साल पहले विक्रमी संवत की शुरुआत की थी.  

चन्द्रगुप्त द्वितीय अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (शासन: 380-412 ईसवी) गुप्त राजवंश का राजा था, समुद्रगुप्त का पुत्र ‘चन्द्रगुप्त द्वितीय’ समस्त गुप्त राजाओं में सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से सम्पन्न था. शकों पर विजय प्राप्त करके उसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की. वह ‘शकारि’ भी कहलाया. वह अपने वंश में बड़ा पराक्रमी शासक हुआ. चीनी यात्री फ़ाह्यान उसके समय में 6 वर्षों तक भारत में रहा. 

चंद्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात के शकों को हराया था
एक मत यह भी है कि गुजरात-काठियावाड़ के शकों का दमन कर उनके राज्य को गुप्त साम्राज्य में मिला लेना लेना चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है. इसी कारण वह भी ‘शकारि’ और ‘विक्रमादित्य’ कहलाया. कई सदी पहले शकों का इसी प्रकार से दमन कर सातवाहन सम्राट ‘गौतमी पुत्र शातकर्णि’ ने भी किया था और वह भी ‘शकारि’ कहलाया था.
गुजरात और काठियावाड़ की विजय के कारण गुप्त साम्राज्य की सीमा पश्चिम में अरब सागर तक विस्तृत हो गई थी. 

महरौली का लौह स्तंभ 
गुजरात-काठियावाड़ के शक-महाक्षत्रपों के अतिरिक्त गान्धार कम्बोज के शक-मुरुण्डों (कुषाणों) का भी चंद्रगुप्त ने संहार किया था. दिल्ली के समीप महरौली में लोहे का एक ‘विष्णुध्वज (स्तम्भ)’ है, जिस पर चंद्र नाम के एक प्रतापी सम्राट का लेख उत्कीर्ण है. इतिहासकार बताते हैं कि यह लेख गुप्तवंशी चंद्रगुप्त द्वितीय का ही है. इस लेख में चंद्र की विजयों का वर्णन करते हुए कहा गया है, कि उसने सिन्ध के सप्तमुखों (प्राचीन सप्तसैन्धव देश की सात नदियों) को पार कर वाल्हीक (बल्ख) देश तक युद्ध में विजय प्राप्त की थी. 

शायद इन्हीं शक-मुरुण्डों ने ध्रुवदेवी (चंद्रगुप्त की पत्नी) के अपहरण का दुस्साहस किया होगा. जिसके बाद चंद्रगुप्त द्वितीय के प्रताप ने बल्ख तक इन शक-मुरुण्डों को मारा और गुप्त साम्राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा को सुदूर वंक्षु नदी तक पहुंचा दिया. वंक्षु नदी का नाम आक्सस है. यह दक्षिण-पश्चिम एशिया की बड़ी नदियों में से एक है.  

विक्रम संवत के मत में फाह्यन का विवरण
फाह्यान, जो कि एक चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री था, उसने पांचवीं शताब्दी में भारत की यात्रा की थी. उनकी रचनाओं में, विशेष रूप से “फो-कुओ-ची” (भारत और अन्य बौद्ध देशों का वृत्तांत), में उन्होंने उस समय के भारतीय समाज, संस्कृति, और शासन के बारे में विस्तृत जानकारी दी है. हालांकि, फाह्यान ने अपने लेखन में ‘विक्रमादित्य’ नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया, क्योंकि यह एक विशिष्ट शासक का नाम है, जो आमतौर पर गुप्त वंश के चंद्रगुप्त द्वितीय से जुड़ा है. फाह्यान की यात्रा लगभग 380-414 ईस्वी के बीच हुई, जो गुप्त काल के प्रारंभिक चरण से मेल खाती है, जब चंद्रगुप्त द्वितीय का शासन चल रहा था (लगभग 375-415 ईस्वी).

फाह्यान ने मध्य भारत (मगध और उसके आसपास) के शासकों और उनके प्रशासन की प्रशंसा की है. उन्होंने लिखा कि उस समय का शासन सुव्यवस्थित था, लोग समृद्ध और सुखी थे, और बौद्ध धर्म को शाही संरक्षण प्राप्त था। उनके वर्णन में एक शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ राजा का चित्र उभरता है, जो संभवतः गुप्त शासकों, जैसे चंद्रगुप्त II, की ओर इशारा करता हो. फाह्यान ने यह भी उल्लेख किया कि लोग करों से बहुत अधिक दबे नहीं थे, अपराधियों को दंड देने में नरमी बरती जाती थी, और मृत्युदंड दुर्लभ था. इसके अलावा, फाह्यान ने बौद्ध मठों और स्तूपों के निर्माण में शाही समर्थन का भी जिक्र किया है.

सिंहासन बत्तीसी और बेताल पचीसी में विक्रमादित्य

असल में विक्रमादित्य कौन था इस सवाल का जवाब स्पष्ट नहीं है, लेकिन ईसा पूर्व शकों के आक्रमण और उन पर विजय के जो ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, उससे विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता और प्राचीनता सामने आती है. बाद में इन्हीं विक्रमादित्य को लोक में कई कथाओं और किवदंतियों के जरिए अमर किया गया और इनसे जुड़ी कथाओं में चमत्कार और देवी-देवताओं की मौजूदगी भी मिलती है. सिंहासन बत्तीसी और बेताल पच्चीसी ऐसी ही कथाएं हैं. 

सिंहासन बत्तीसी में तो विक्रमादित्य की न्यायप्रियता और तेज से भरापूरा उनका एक सिंहासन है जो कहानी का केंद्रीय पात्र है. उज्जैन के बाहर एक टीले की खुदाई में यह सिंहासन मिलता है और फिर से जीवंत हो उठता है. इसमें मौजूद 32 पुतलियां सम्राट विक्रमादित्य की कथा सुनाती हैं, जिसमें उन्हें विष्णु भक्त, महाकाल का कृपा पात्र, काली का वरदानी, देवी लक्ष्मी से संपन्न और इंद्र का मित्र तक बताया गया है, जिनकी आकाश मार्ग से स्वर्ग तक की आवाजाही थी. 

विक्रमादित्य को लेकर हैं कई लोककथाएं
विक्रमादित्य को लेकर कई तरह की लोककथाएं और किवदंतिया मध्य प्रदेश से लेकर पूरे भारत में मौजूद हैं. ये किवदंतिया मंदिरों की ऐतिहासिकता से भी जुड़ी हैं. एक ऐसा ही दिव्य शक्तिपीठ महाकाल की नगरी यानि कि उज्जैन में स्थित है. इस पावन शक्तिपीठ को लोग हरसिद्धि माता के मंदिर के नाम से जानते हैं. मान्यता है कि जिस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी, वह उज्जैन के रुद्रसागर तालाब के पश्चिमी तट पर स्थित है. हरसिद्धि देवी के मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें देवी का कोई विग्रह नहीं है, बल्कि सिर्फ कोहनी ही है, जिसे हरिसिद्धि देवी के रूप में पूजा जाता है. मंदिर के मुख्य गर्भगृह में माता हरसिद्धि के आस-पास महालक्ष्मी और महासरस्वती भी विराजित हैं.

कहते है कि हरसिद्धि माता के इस मंदिर में सम्राट विक्रमादित्य हर बारहवें वर्ष में अपना शीश माता के चरणों में अर्पित कर देते थे, लेकिन हरसिद्धि देवी की कृपा से उन्हें हर साल एक नया सिर मिल जाता था. मान्यता है कि जब बारहवीं बार उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो सिर फिर वापस नहीं आया और उनका जीवन समाप्त हो गया था. मान्यता है कि मंदिर परिसर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे मुण्ड राजा विक्रमादित्य के ही हैं.

ये तो थी विक्रमादित्य की बात जो भले ही इतिहासकारों के बीच बहस का मुद्दा रही हो, लेकिन विक्रम संवत की सटीकता पर अब तक कोई सवाल नहीं उठे हैं. प्राचीन ग्रंथ सूर्य सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15 घटी 31 विफल तथा 24 प्रति विफल लगाती है. आधुनिक विज्ञान कुछ वर्ष पहले ही गणना कर पाया, इससे पहले यूरोप में एक वर्ष 360 दिन का हुआ करता था. विक्रम संवत में महीना 30 या 31 दिन का नहीं बल्कि 30 दिन का होता है. हर तीसरे वर्ष पर एक अतिरिक्त मास होता है, जिसे अधिक मास या मलमास कहते हैं ताकि इसे सूर्य वर्ष से मिलाया जा सके. इसके कारण महीनों और ऋतुओं का तालमेल सबसे सटीक रूप से बैठता है. यही कारण है कि सभी भारतीय मत और संप्रदाय अपने त्यौहार व शुभ मुहूर्त विक्रम संवत से ही निकालते हैं.

नेपाल में प्रचलित है विक्रमी संवत
हालांकि आजादी के बाद देश में जिसे राष्ट्रीय पंचांग के तौर पर मान्यता मिली है, वह शक संवत ही है, जो कि ईसा से 135 वर्ष बाद शुरू हुआ था, लेकिन नेपाल में अभी भी विक्रमी संवत ही मुख्य संवत के तौर पर माना जाता है. विश्व में जहां-जहां अंग्रेजों के उपनिवेश रहे वहां बाद में ग्रेगेरियन कैलेंडर को मान्यता मिली, लिहाजा आज दुनियाभर के कैलेंडर ईस्वी सन के अनुसार तारीख लिखते हैं. लेकिन विक्रमी संवत की तरह, ऋतु परिवर्तन की सटीक जानकारी, ग्रहण का काल, तिथि और मुहूर्त की गणना किसी और कैलेंडर में नहीं मिलती है. इसी विक्रमी संवत के नए वर्ष की शुरुआत आज से हो रही है.



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